farhan ali qadri
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Farhan Ali Qadri - खुसरवी अछी लगी ना सरवरी अछी लगी
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खुसरवी अछी लगी ना सरवरी अछी लगी

खुसरवी अछी लगी ना सरवरी अछी लगी
हम फकीरों को मदीने की गली अछी लगी
दूर थे तोह ज़िन्दगी बेरंग थी बेकैफ थी
ऊन कय कूचय मै गये तो ज़िन्दगी अछी लगी
मै ना जाऊँगा कहीं भी दर नबी का छोड़ कर
मुझ को कोयए मुस्तफा की चाकरी अछी लगी
यूं तो कहने को गुजारी ज़िन्दगी मैं ने मगर
जो दर-ए-आक़ा पे गुजरी वोह घडी अछी लगी
वालिहाना हो गए जो तेरे क़दमों पर निसार
हक़ ताला को अदा इन कि बड़ी अछी लगी
नाज़ कर तू अये हलीमा सरवर-ए-कोनैन पर
ग़र लगि अछी तो तेरी झोपडी अछी लगी
रख दिया सरकार के क़दमों में सुल्तानों ने सर
सरवर-ए-कोन-ओ-मकान कि सादगी अछी लगी
आज महफ़िल में नियाज़ी नात जो में ने पढ़ी

आशिक़ान-ए-मुस्तफा को वोह बड़ी अछी लगी


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