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या रब नसीब हो दरे महबूब पर क़याम
सल्ले अला नबियेना सल्ले अला मुहम्मदिन
या रब नसीब हो दरे महबूब पर क़याम
तैबा के रात दिन हों मदीने के सुबहो शाम
गुज़रे हयात ख्याले रसूले करीम में
चूमे निगाह बामो दर सय्यद–उल–अनाम
सल्ले अला नबियेना सल्ले अला मुहम्मदिन
अल्लाह से थीं तूर पे बातें कलीम की
सरकार लामकां में हुए हक़ से हम कलाम
सल्ले अला नबियेना सल्ले अला मुहम्मदिन
इस बारगाहे पाक़ की अल्लाह रे अज्मतें
जिस बारगाहे पाक का जिब्रील है ग़ुलाम
सल्ले अला नबियेना सल्ले अला मुहम्मदिन
बेहतर है सारी सुबहों से तैबा की इक सुबह
अफज़ल है सारी शामों से तैबा की इक शाम
सल्ले अला नबियेना सल्ले अला मुहम्मदिन
मिलती रहे फ़कीर को तेरे करम की भीख
हासिल रहे ग़रीब को कैफि़यत बादम
दोनों जहाँ में तेरे सिवा और कौन है
मौलाए कुल शफीऐ उमम रहमतिश तमाम
सल्ले अला नबियेना सल्ले अला मुहम्मदिन
हल हो गई है मुश्किल मुझ खस्ता हाल की
जब भी ज़बान पे आया है मुश्किल कुशा का नाम
सल्ले अला नबियेना सल्ले अला मुहम्मदिन
इन पर दुरूद जिन से है क़ाबा की आबरू
इन पर सलाम जिन से मदीना नेक नाम
सल्ले अला नबियेना सल्ले अला मुहम्मदिन
या रब नसीब हो दरे महबूब पर क़याम
तैबा के रत दिन हों मदीने के सुबहो शाम
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