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क्या ख़बर क्या सज़ा मुझ को मिलती
क्या ख़बर क्या सज़ा मुझ को मिलती
मेरे आक़ा ने इज्ज़त बचा ली
फर्दे इसियाँ मरी मुझ से ले कर
काली कमली में अपनी छुपा ली
वो अता पर अता करने वाले
और हम भी नहीं टलने वाले
जैसी ड़योढ़ी है वैसा भिखारी
जैसा दाता है वैसे सवाली
क्या ख़बर क्या सज़ा मुझ को मिलती
मेरे आक़ा ने इज्ज़त बचा ली
मैं गदा हूँ मगर उन के दर का
वो जो सुल्ताने कोनो मकां हैं
यह ग़ुलामी बड़ी मुस्तनद है
मेरे सर पे है ताजे बिलाली
क्या ख़बर क्या सज़ा मुझ को मिलती
मेरे आक़ा ने इज्ज़त बचा ली
मेरी उमरे रवां बस ठहर जा
अब सफ़र की ज़रूरत नहीं है
उन के क़दमों में मेरी जबीं है
और हाथों में रौजे की जाली
क्या ख़बर क्या सज़ा मुझ को मिलती
मेरे आक़ा ने इज्ज़त बचा ली
मैं मदीने से क्या गया हूँ
ज़िन्दगी जैसे बुझ सी गई है
घर के अन्दर फिज़ा सूनी सूनी
घर के बाहर समां खाली खाली
क्या ख़बर क्या सज़ा मुझ को मिलती
मेरे आक़ा ने इज्ज़त बचा ली
मैं गदागर हूँ मगर उन के दर का
वो जो सुल्ताने कोनो मकां हैं
यह ग़ुलामी बड़ी मुस्तनद है
मेरे सर पे है ताजे बिलाली
मैं फ़क़त नाम लेवा हूँ उन का
उन की तौसीफ मैं क्या करूंगा
मैं न इक़बाल खुसरो न सादी
मैं न कुदसी न जामी न हाली
क्या ख़बर क्या सज़ा मुझ को मिलती
मेरे आक़ा ने इज्ज़त बचा ली
फर्दे इसियाँ मरी मुझ से ले कर
काली कमली में अपनी छुपा ली
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