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सरकार-ए-दोआलम के देखो हर सिम्त नजारे होते हैं
सरकार-ए-दोआलम के देखो हर सिम्त नजारे होते हैं
कोनैन उधर हो जाती है जिस वक़्त इशारे होते है
महताब के टुकडे होते हैं सूरज भी उल्टा फिरता है
जिस वक़्त मदीने वाले की ऊँगली के इशारे होते हैं
लोटा ना कोइ दर से खाली माँगा जो किसी ने मिल ही गया
वोह दर है नबी का जिस दर पर मंगतों के गुज़रे होते हैं
येह काबा नही येह तूर नही येह दर हय रसूल-ए-अॅक्रम का
ईस काक के ज़र्रों पर सद्क़य महताब सितारे होते हैं
दरबार-ए-नबी मै अये मुस्लिम हम को भि खुदा पहुंचा देवे
सुनते है वहां पर बन्दों को मोला के नज़रे होते हैं
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